6. अस्पृश्यता और अराजकता - Page 88

अस्पृश्यता और अन्याय

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‘‘एक बरात दिल्ली के पास से गुजर रही थी, जिसमें दूल्हा पालकी में बैठा हुआ था। इस पर ऊंची जाति के लोगों की भौंहें चढ़ गईं और उन्होंने इसे अपना अपमान समझा। उन्होंने दो दिन तक बरात को भूखा-प्यासा रोके रखा। आखिर में पुलिस आई और उसने इन अत्याचारियों को खदेड़ दिया तथा बरात को मुक्ति दिलाई।’’

जून 1938 की ‘जीवन’ पत्रिका सेः

  1. ‘‘सैवड़ा गांव में गोला (पूर्व ठाकुर) लोगों ने जो कांग्रेसी होने का गर्व करते हैं, इस गांव के निहत्थे जाटवों को भालों और लाठियों से इस कदर बेरहमी से मारा-पीटा कि इनमें से पांच अस्पताल में घायल पड़े हैं, उनके हाथ-पांव और पसलियां तोड़ दी गई हैं। बंसी नाम के एक आदमी की खोपड़ी की हड्डियां टूट गई हैं और वह अब तक बेहोश पड़ा है। इस घटना का कारण यह था कि गांव में जब इन लोगों की बरात आई तो दूल्हे ने चमकीना मौर पहन रखा था। इससे ठाकुरों को मिर्चं लग गईं और उन्होंने बरात पर हमला करना चाहा। लेकिन वे इसलिए पीछे हट गए, क्योंकि बरातियों की संख्या ज्यादा थी। उन्हें अपनी जमींदारी में बरातियों को गालियां देकर ही संतोष कर लेना पड़ा।’’

  2. ‘‘आगरा जिले की तहसील फतेहगढ़ के गांव दोर्रा में मोती राम जाटव के यहां रामपुर गांव से बरात आई। दूल्हे ने चमकीना मौर पहन रखा था और बरात के साथ बैंड-बाजा चल रहा था, साथ ही आतिशबाजी भी हो रही थी। इस पर सवर्ण हिंदुओं ने एतराज किया कि बरात के साथ बाजा नहीं बज सकता और आतिशबाजी नहीं हो सकती। मोती राम ने इसका विरोध किया। उसने कहा कि हम भी उसी तरह के इंसान हैं, जैसे और लोग हैं। इस पर सवर्ण हिंदुओं ने मोती राम को पकड़ लिया और उसकी पिटाई की तथा बरात पर भी हमला किया। मोती राम की पगड़ी में पंद्रह रुपये और एक आना बंधा हुआ था, वह भी छीन लिया गया।’’

  3. ‘‘जब एक बरात प्रेम सिंह दिलवर सिंह नाम के जाटवों के यहां गांव खुर्वा जा रही थी जो अलीगढ़ के सासनी थाने के अंतर्गत पड़ता है, तो इस बरात को सवर्ण हिंदुओं ने रास्ते में ही रोक दिया और कहा कि जब तक तुम बाजा बजाना बंद नहीं करोगे, आगे नहीं बढ़ सकते। बरातियों को जान से मार देने और लूट लेने की धमकी दी गई। सवर्ण हिंदू जाटवों से पहले ही चिढ़े बैठे थे, क्योंकि उन्होंने बेगार करना बंद कर दिया था, ऊपर