74 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
से उन्होंने गाजे-बाजे से बरात चढ़ाकर आग में घी डाल दिया। जब बरात ने बाजा बजाना नहीं रोका तो हिंदुओं को इतना क्रोध आया कि उन्होंने बरात पर पथराव किया।’’
चौबीस मार्च 1945 के ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ में भी इसी विषय पर एक समाचार छपा हैः
‘‘लैंड्स डाउन सब-डिवीजन में धनौरी गांव के शिल्पकार की एक बरात दूल्हे को पालकी में ठिकाकर मालधंगु गांव में दुल्हन के घर जा रही थी। रास्ते में एक आदमी ने, जो अपने आपको मालधंगु गांव के पटवारी का एजेंट कहता था, बरातियों को यह सलाह दी कि वे सवर्ण हिंदुओं के लड़ाई-झगड़े से बचने के लिए दूसरे रास्ते से जाएं।
उसकी सलाह मानकर बरात जंगल के रास्ते चल दी। जब वे एक बियाबान जगह में पहुंचे, तब एक सीटी के बजे ही लगभग दो सौ सवर्ण हिंदू इकट्ठा हो गए। कहा जाता है कि इन हिंदुओं ने बरातियों पर हमला बोल दिया और वे पालकी उठाकर ले गए।
शिल्पकार की बरात दो दिन बाद दुल्हन के घर पहुंची। कहा जाता है कि विवाह सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट तथा पुलिस की देख-रेख में हुआ। इस सिलसिले में पटवारी को निलंबित कर दिया गया है।’’
लाहौर के ‘सिविल एंड मिलीटरी गजट’ के 24 जून, 1945 के अंक में निम्नलिखित रिपोर्ट छपी हैः
‘‘कल ग्वालियर रियासत के एक गांव में फरसा, लाठियां और कटारे लिए हुए राजपूतों का एक दल वहां के कुछ हरिजनों पर टूट पड़ा, जिसमें एक हरिजन की मृत्यु हो गई और चार गंभीर रूप से घायल हो गए।
राजपूतों और हरिजनों के बीच यह तनातनी तभी से चल रही थी, जब वहां के हरिजनों ने ग्वालियर दरबार के एक उत्तराधिकारी का जन्म होने के उपलक्ष्य में एक जुलूस निकाला। राजपूतों ने इसका विरोध किया, क्योंकि उनका कहना था कि हरिजनों को ऐसे समारोह करने का कोई भी अधिकार नहीं है।
पिछले महीने महाराजा ने एक आदेश जारी किया है, जिसके अनुसार हरिजनों को समान अधिकार दे दिए गए हैं।’’
जब कभी अस्पृश्य लोग हिंदुओं के रीति-रिवाज को अपनाने और कुछ ऊंचा