अस्पृश्यता और अन्याय
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उठने की कोशिश करते हैं, तब हिंदू उनके साथ कितना बर्बरतापूर्ण व्यवहार करते हैं, इस संबंध में उदाहरण स्वरूप ‘बंबई समाचार’ के 4 नवबंर, 1936 के अंक में यह घटना छपी हैः
‘‘मलाबार में उत्तपलम में एझवा जाति का शिवरामन नाम एक एक 17 वर्षीय युवक एक सवर्ण हिंदू की दुकान से नमक खरीदने गया और उसने ‘नमक’ के लिए ‘उप्पू’ कहा, जो मलयालम भाषा का शब्द है। मलाबार में वहां के रीति-रिवाजों के अनुसार हिंदु ही नमक को ‘उप्पू’ कह सकते हैं। हरिजन होने के नाते उसे ‘पुलिचाटन’ शब्द का उच्चारण करना चाहिए था। इस पर ऊंची जाति के दुकानदार को बड़ा क्रोध आया और कहा जाता है कि उसने शिवरामन को इतना मारा कि वह परलोक सिधार गया।’’
निम्नलिखित घटनाएं ‘समता’ से संकलित की गई हैंः
‘‘काठी (जिला पूना) में लोगों ने अस्पृश्यों को इसलिए सताना शुरू कर दिया है, क्योंकि वे अभिवादन करने के लिए ‘राम-राम’ और ‘नमस्कार’ कहने लग गए हैं। जो लोग यह नहीं जानते हैं, वे कृपया यह जान लें कि ऊंची जाति के लोग ही इस प्रकार अभिवादन कर सकते हैं। महार आदि जाति के लोगों को चाहिए कि वे अभिवादन करते समय ‘जोहार’ या ‘पाय लागू’ कहा करें।
तनू (जिला पूना) के अस्पृश्यों ने स्पृश्य जाति के हिंदू लोगों की तरह व्यवहार करने की कोशिश की। इस धृष्टता के परिणामस्वरूप अधिकांश को गांव छोड़ देना पड़ा है और कुछ बावड़ा चले गए हैं।
वलापुर (जिला शोलापुर) में महारों पर इसलिए अत्यचार किया जा रहा है, क्योंकि उन्होंने सवर्ण हिंदुओं को ‘साहेब’ और ‘पाय लागू’ कहने से मना कर दिया है।
जमाबाद (जिला शोलापुर) के अस्पृश्यों ने अपने स्पृश्य जाति के मालिकों के मनोरंजनार्थ नाचने और तमाशा करने से इंकार कर दिया था। इसलिए उनको मारा-पीटा गया, उनकी झोपडि़यां जला दी गईं या मिटा दी गईं और उन्हें गांव की सीमा से बाहर निकाल दिया गया।
बावड़ा (जिला पूना) में अस्पृश्यों ने अपनी बिरादरी वालों से कहा कि वे ऊंची जातियों की जूठन खाना छोड़ दें, मरे ढोर न उठाएं और अन्य गंदे काम न करें। गांव के मुखियाओं ने महारों से कहा कि उनका धर्म यही है कि वे अब तक जिस तरह खाना खाते वे जो काम करते आए हैं, वही वे आगे भी