76 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
करते रहें। जिन महारों ने अपना पुराना और सदियों से चला आ रहा ‘धर्म’
छोड़ दिया, उन्हें लोगों ने मारा-पीटा और गांव से बाहर निकाल देने की ध
मकी दी।’’
XII
हिंदू अस्पृश्यों के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं, जैसे अस्पृश्यों का जन्म हिंदुओं की सेवा करने के लिए हुआ है। चूंकि अस्पृश्यों का कर्तव्य सेवा करना है, इसलिए जब कभी कोई हिंदू किसी अस्पृश्य को सेवार्थ बुलाए तब वह उस हिंदू की सेवा करने से इंकार नहीं कर सकता। गांव में हिंदुओं की यह धारणा है ि कवे अस्पृश्यों के श्रम का मनमाना उपयोग कर सकते हैं। इस व्यवस्था को बेगार या जबरन मजदूरी कहा जाता है। अगर अस्पृश्य इस व्यवस्था को स्वीकार करने से इंकार करता है, तब इसके गंभीर परिणाम होते हैं, जो निम्नलिखित उदाहरणों से स्पष् हो जाएगा।
दिसम्बर 1938 के ‘जीवन’ में निम्नलिखित घटनाएं छपी हैंः
‘‘उन्नतीस नवंबर 1938 को मथुरा जिले के कोहाना गांव के जाटवों को
वहां के जाटों और ब्राह्मणों ने बुरी तरह सताया, क्योंकि उन्होंने बेगार करने से
इंकार कर दिया।
इस गांव के ठाकुर और ब्राह्मण जाटवों से बेगार कराते थे और उन्हें परेशान
करते थे। जाटवों ने बेगार न करने का फैसला किया और केवल वही काम
करने के लिए कहा, जिसकी उन्हें मजदूरी मिलेगी। हाल ही में गांव में एक
बैल मर गया। ठाकुर और सवर्ण जाति के दूसरे हिंदुओं ने जाटवों पर दबाव
डाला कि वे उसे उठाएं, लेकिन उन्होंने कहा कि वे उसे तभी उठाएंगे, जब
उन्हें इसकी मजदूरी दी जाएगी। इससे हिंदुओं का क्रोध भड़क उठा। उन्होंने
एक भंगी से कहा कि वह जाटवों के कुएं में पाखाना डाल दे, और जाटवों
से कहा कि वे शौच आदि के लिए उनके खेतों में नहीं जा सकते। उनहोंने
यह तय कर लिया कि वे उन्हें हर तरह से सताएंगे।
जब जाटवों ने भंगी को अपने कुएं में पाखाना डालने से रोका तो उसने
जाटों, ठाकुरों और ब्राह्मणों को बुला लिया, जो हमला करने के लिए पहले से
ही तैयार बैठे थे। वे लाठी लेकर उन पर टूट पड़े और उनको खूब मारा-पीटा
और उन्होंने उनके घरों को आग भी लगा दी। इससे छह घर जलकर राख हो