अस्पृश्यता और अन्याय
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गए और अठारह जाटव गंभीर रूप से घायल हो गए। हमलावर उनके घर की काफी संपत्ति लूट कर ले गए।’’
इसी पत्रिका के फरवरी 1939 के अंक में एक और खबर छपीः
‘‘आगरा जिले के किरावली तहसील में अभयपुरा गांव के जाट वहां के गरीब अनुसूचित जाति के लोगों से बेगार कराते थे और मजदूरी मांगने पर उन्हें पीटे देते थे। करीब तीन महीने पहले सुखी नाम के एक जाट ने सुखराम, घनश्याम और हुक्मा नाम के जाटवों से जबरदस्ती काम कराया और उनहें मजदूरी नहीं दी। ये लोग इनकी जबरदस्तियों से इतने परेशान हुए कि उन्होंने गांव ही छोड़ दिया और दूसरे गांव में जाकर अपने रिश्तेदारों के यहां रहने लगे। इधर जाट उनके बर्तन और घर का का दूसरा सामान उठाकर ले गए और उसे अनाज रखने वाली कोठरी में ले जाकर छिपा दिया।’’
तीन जून 1945 के ‘सावधान’ में एक घटना का ब्यौरा इस प्रकार छपा हैः
‘‘अनुसूचित जाति की महाराजी कोरी नाम की एक औरत ने श्री महबूब आलम, सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत में धारा 376, 341 और 354-क के अधीन जुबी पुलिस चौकी के ब्रह्म सिंह, सुलेमान और आफताब नाम के तीन सिपाहियों के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराई है। शिकायत में कहा गया है कि 2 मई, 1945 की रात को लगभग साढ़े दस बजे पुलिस के ये तीन सिपाही, सुमेर, कहार, कल्लू बीबी का बेटा और कुछ और लोगों के साथ आए और उसके घर की तलाशी ली तथा उसको अपने साथ थाने ले गए और उसे सारी रात थाने में रखा। सवेरे ये सिपाही उसे एक छोटी-सी कोठरी में ले गए। उसे अंदर से बंद कर दिया और इन तीनों ने एक-एक करके उसकी इज्जत लूट ली। उसके बाद उसे फिर एक दूसरी छोटी कोठरी में ले जाया गया, जहां उसके गुप्तांगों में लकड़ी का कोयला, कागज के टुकड़े भर दिए और अपना लिंग उसके मुंह में डाल दिया, उसके कपड़े फाड़ डाले गए जो खून से लथपथ हो गए थे। अगले दिन उसकी मां से दिन-भर जबरदस्ती बेगार कराया गया और उन्हें रात के दस बजे छोड़ दिया गया।
महाराजी की देवरानी मुरला ने भी ऐसी ही शिकायत दर्ज कराई है। उसका कहना है कि वही सिपाही उसी रात उसे पुलिस चौकी ले गए और फिर उसे वापस भगा दिया। रास्ते में उसे कुमार टोला के पास मदारी तेली ने पकड़ लिया। वह उसे एक खंडहर में ले गया और वहां उसने उसकी इज्जत को लूटा। सर्वश्री मुन्नालाल भूषण और राम भरोसे वकील मुरला की ओर से