प्रजातंत्रवाद या नाजीवाद - Page 402

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प्रजातंत्रवाद या नाजीवाद

भारत सरकार के अम सदस्य माननीय डाक्टर बी. आर. अम्बेदकर का

२७ जुलाई, सन १९४२ ई. का वक्तव्य जो उन्हांने

समाचारपत्रो मे छपने के लिये दिया :

“ कोई भी यह आशा नहीं कर सकता कि गान्धीजी के विचार सदा एकसे रहेंगे पर सभी को यह आशा थी और सभी को यंह आशा करने का अधिकार था कि वह अपनी जिम्मेदारी समझेंगे। इसमें कोई सन्देह नहीं कि गान्धीजी का जन-आन्दोलन चलाने का यह काम गैर-जिम्मेदारी और पार्गलपन का है!

“ यह समझना कठिन है कि गांधीजी ने इतने बडे संकटकाल में एक ऐसी अनर्थकारी योजना चलाना क्यों जरूरी समझा | मेरे लिए कुज बातें स्पष्ट है | जहां तक भारत के राजनीतिक उद्देश्यों को प्राप्त करने-का सम्बन्ध है कोई भी डस. बात को अस्वीकार नहीं कर सकता कि अंग्रेज लोग भारतवासियों को शासन करने का अधिकार बराबर देते रहे हैं और हाल में तो ये अधिकार शीघ्रता से मिल रहे हैं । इसी तरह यह भी स्पष्ट है कि अंग्रेज अन्तिम खाई में जाकर मोर्चा नहीं लेना चाहते और भारत की राजनीतिक उन्नति में कोई रुकावट नहीं डालना चाहते । यदि इस बात के लिए किसी प्रमाण की जरूरत है तो क्रिप्स के प्रस्ताव मौजूद हें । उनमें (१) स्वतंत्रता और, (२) विधान-सम्मेलन, जो ` कांग्रेस की दो मांगें है वे मान ली गई हैं |

“ क्रिप्स प्रस्ताव के बाद गांधीजी की यह बात मानना कठिन है कि अंग्रेज लोक भारतवासियों को अधिकार देना नहीं चाहते। यह एक ऐसी झूठी बात है जो जान बूझकर कही गई हैं | यदि भारतवासी स्वतंत्रता को औपनिवेशिक स्वराज्य से अधिक अच्छा समझते हैं, तो मेरी समझ में क्रिप्स प्रस्तावों के गिर जाने का यह मतलब नहीं होता कि ब्रिटिश सरकार स्वतंत्रता देने के लिए बाध्य नहीं है । यह बात समझ में नहीं आती कि जब क्रिप्स प्रस्तावों से स्वतंत्रता और विधान-सम्मेलन.मिल जाते हैं तो कांग्रेस ने उन्हें क्यों नहीं माना | यदि सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाने का कारण यह है कि भारतवासियों को रक्षाविभाग नहीं