प्रजातंत्रवाद या नाजीवाद - Page 405

प्रजातंत्रवाद या माजीवाद 3६३

छोड़ देना चाहिये कि वही धर्म के पथ पर है और उसे यह बात मान लेनी चाहिये कि वे लोग भी जिनका उससे मतभेद हैं, यदि अधिक नहीं, तो कम से कम उतने . ही देशभक्त है । मैं समझता हूं कि कांग्रेस और उसके समाचारपत्र बराबर अल्प संख्यक जातियों के नेताओं पर इस प्रकार जो मूर्खता से भरे हुए और निराधार इलजाम लगाते रहते हैं, उससे साम्प्रदायिक समझौते का प्रश्‍न और भी कठिन हो गया है। यदि इसका मतलब दुसरी बात से है तो निःसंदेह यह एक ऐसी चाल है जो धोखा देने के लिये चली गई है । इन दोनों ही बातों से मालूम होता है कि गांधीजी की राजनीतिज्ञता का दिवाला निकल गया है |

“ गांधीजी की समझ में एक बात नहीं आई और उसे वह जितनी ही जल्दी समझ लें अच्छां होगा । उनके राजनीतिक गुण, जिनका बहुत ढिंढोरा पीटा गया, वे यह थे : हिंदू-मुस्लिम एकता स्थापित करना और अछूतों की सेवा करना | अब २० वर्ष बीतने पर न तो मुसलमान और न अछूत ही गांधीजी पर विश्वास करते हैं |

” गांधीजी के जीवन की यह सबसे बड़ी दुर्घटना है। जितनी ही जल्दी गांधीजी इस बात को समझ लें उतना ही अच्छा ern! अभी गांधीजी अल्प संख्यकों के नेताओं को सलाह करने के लिये बुला सकते हैं। यह कहना बेकार है कि वे ऐसी मांगें पेश करते हैं, जो पूरी न की जा सकें क्योंकि गांधीजी जब भी चाहें अल्प संख्यको से कह सकते हैं कि वे इस बात पर राजी हो जायें कि उनके मामले अन्तर्राष्ट्रीय पंचायत के पास फैसले के लिये भेज दिये जायें |

* साधारण जनता के लिये ऐसा कोई कारण नहीं कि वह गांधीजी के इस काम का समर्थन करें। यह काम न होना चाहिये था। कोई कारण नहीं कि अल्प संख्यक गांधीजी से मिलें, क्योंकि वह साफ और इमानदारी के साथ कोई ऐसा आश्वासन नहीं देते जिससे नये विधान में उनके हितों की रक्षा हो सके |

" हम ऐसे संकटपूर्ण समय में हैं कि गांधीजी के साथ केवल अपने मतभेद प्रकट करने से ही हमारा कर्तव्य नहीं पूरा होता । हमारा कर्तव्य यह है कि वे लोग जो गांधीजी के आन्दोलन में विश्वास नहीं करते ऐसे कार्य करें जिससे आन्दोलन आरम्भ न न हो सके । क्योंकि मुसलमान और अछूतों ने सन्‌ १९३० ई. के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में कोई भाग नहीं लिया था फिर भी उन्होंने उसकी ओर उदार तटस्थता को नीति ग्रहण की थी। सन्‌ १९३० ई. की स्थिति आज की,स्थिति से भिन्न थी) सन्‌ १९३० ई. के सविनय अवज्ञा आन्दोलन में केवल दो संभावनायें थी ; या तो राजनीतिक शक्ति अंग्रेजों के हाथ में रहती या भारतीयों के हाथ में